Tuesday, 7 May 2013




               भट्काव्

रास्तो मे भी अब तो रास्ते नही 
रिश्ते अगर खुन के है तो भी दर्द् किसी के वास्ते नही
जिस गोद मे सोये बरसो,जिन हाथो के सहारे चले
जिस शक्स से बोलना सीखा जिस घर मे पले
जिस्ने हमे पहचान दी,जिसने हमे नाम दिया
जिसने हमे ज्ञान दिया,ज़िन्द्गी का वरदान दिया
वो लोग आज पुराने हो गये
उनके वचन सुन तुम कह्ते हो के वो अब सयाने हो गये
गोद अब मा की हमे भाती नही 
नीन्द अब फेस्बुक के बिना आती नही
जिस पिता के सहारे बार बार लड्ख्डाकर भी अपने पैरो पर् खडे हुए  

उस पिता को आज सहारे के लिये लकडी थमा दी
क्योकी हाथो मे तो गर्लफ्रेन्ड् ने अपनीबिल्ली पकडा दी
जिस परिवार ने बात करने के लिए बोल दिए...
उसी परिवार को एक गहरी खामोशी दे दी
अपने बोलो से एसे तोडा गुरुर उनका वो फिर बोल ही न सके
गैरो के संग शब्दो की माला पिरो ली
जिस घर मे पले अब वो छोटा लगता है
महलो का अरमान लिए निकले घर से
बाहर आकर देखा दुनिया मे
मेरा घर मेरी जन्नत है ,मा बाप हमारे दौलत दुनिया की है
लेकिन अब खो गया है सब
बस पत्थर हुआ दिल 
और हर पल मुझको रोता लगता है
ज़िन्द्गी का ये सफर अब बोझ लगता है।

अनामिका विजय्


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